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Monday, June 6, 2011

एक रेलगाड़ी और हम - डॉ नूतन गैरोला

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मैंने देखा था इक सपना
एक रेलगाड़ी और हम
पिताजी टिकट ले कर आते हुवे
और लोग स्टेशन का पता पूछते हुवे 
इतने  में रेल चल पड़ी थी
खड़े रह गए थे वो(पिता जी ) अकेले स्टेशन में
बेहद घबराये छटपटाये थे 
और याद नहीं घर के लोग किधर बिखर गए थे
रेलगाडी दौड़ रही थी सिटी बजाती
और उस डब्बे में थे तुम और मैं
और कुछ भीड़ सी औरतों की, मर्दों की,
भजन गाती|
कुछ अनचाहे चेहरे, क्रूर से, मेरे पास से गुजरे थे
और तुम ने समेट लिया था मुझे,
छुपा लिया था मुझको  खुद के आगोश में
स्नेह भरे उस आलिंगन में फेर लिया था मेरे सर पे हाथ
कितना  भा रहा था मुझको तेरा मेरा साथ
भीग रहा था मन और तन, झूम स्नेह की बरखा आई
इतने  में एक आवाज तुम्हारी पगी प्रेम में  आई
जो बोला  तुमने भी न  था, न मैंने कानों से सुनी
वो आवाज मेरी आँखों ने मन-मस्तिष्क से पढ़ी  
तुमने कहा मजबूत बनों खुद, ये साथ न रहे कल तो?
और तुम्हारे चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच आयीं थी |
जाने क्यों वक़्त रेल की गति से तेज भागता जाने कहाँ रिस गया
जाने क्यों मैं नीचे की बर्थ पे बैठी रही
और तुम ऊपर की बर्थ में कुछ परेशान सोच में |
रेल धीरे.. धीरे... धीरे.... और रुकने लगी
साथ भजन की आवाजे तेज तेज तेजतर गूंजने लगी
जाने क्यों में रेल से नीचे उतर आयी कानों में लिए भजन की आवाज
रेल का धुवां और सिटी की आवाज जब दूर से कानों पे आई
तो जाना मैं अकेले स्टेशन में थी
और वह रेल तुम्हें ले कर द्रुत गति से चल दी थी आगे कहाँ, जाने किस जहां
तुम्हारे वियोग में मैं हाथ मलती खड़ी बहुत पछताई
और टूट गया था वो सपना, था वो कुछ पल का साथ
मैं भीगी थी पसीने से और बीत रही थी रात
आँसू के सैलाब ने मुझको घेरा था
मैंने जाना सब कुछ देखा जैसा, वैसा ही तो था
क्यों पिताजी की आँखों में सदा रहती थी नमी
हमारी खुशियों की खातिर सदा मुस्कुरा रहे थे वो
जब कि उनको भी बेहद कचोट रही थी कमी...
तब चीख के मैंने उन रात के सन्नाटों को पुकारा था...
उस से पूछा था
तुम कहीं भी फ़ैल जाते हो एक सुनसान कमरे से एक भीड़ में
अँधेरे से उजाले में, धरती-पाताल से आकाश और दूर शून्य में
और वो तारा टिमटिमा रहा है जहाँ, वहाँ भी तो तुम रहते हो
फिर तुमने देखा तो होगा उनको .. बोलो बोलो मेरी माँ है कहाँ ..
सन्नाटा भी था मौन और फिर हवा से कुछ पत्तों के गिरने की आवाज थी..
जैसे कह रहें हों  कि जो आता है जग में वो एक दिन मिट्टी में मिल जाता है..
तुम मिट्टी में मिल गयी ये स्वीकार नहीं मुझको
फिर वो रेल कहाँ ले गयी तुमको
किस परालोकिक संसार में
पुकारती हूँ तुमको फिर भी इस दैहिक संसार में ...
बोलो मेरी प्यारी माँ तुम कहाँ, तुम कहाँ 
इंतजारी है मुझको अब उस रेल की
तुमसे दो घडी का नहीं, जन्म जन्म के मेल की ..





डॉ नूतन गैरोला

12 comments:

anupama's sukrity ! said...

नूतन जी कई दिनों के बाद आपकी रचना पढ़ रही हूँ ...!!रचना आपकी बहुत ही खूबसूरत है ..!!कई दिनों पहले पढ़ी है ..लग रहा है ...इतनी सुंदर रचना ..छाप छोड़ गयी थी अपनी ...अब जल्दी जल्दी लिखते रहिये ..
शुभकामनायें ...!!

anupama's sukrity!: मर्म का भेद ....!!

सदा said...

भावमय करते शब्‍दों के साथ ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है ।

ajit gupta said...

बहुत अच्‍छी गद्य कविता है लेकिन यह शुद्ध रूप से गद्य में ही लिखी जाती तो बहुत ही सार्थक बनती।

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

mahendra srivastava said...

क्या बात है। बढिया

Dr Varsha Singh said...

तुम कहीं भी फ़ैल जाते हो एक सुनसान कमरे से एक भीड़ में
अँधेरे से उजाले में, धरती-पाताल से आकाश और दूर शून्य में
और वो तारा टिमटिमा रहा है जहाँ, वहाँ भी तो तुम रहते हो.....


गहन अनुभूतियों और जीवन दर्शन से परिपूर्ण इस रचना के लिए बधाई।

रविकर said...

बहुत ही खास |
दिल के बेहद पास ||
जिंदगी की हकीकत के साथ
खुशनुमा एहसास --||

दो घडी का नहीं, जन्म जन्म के मेल की ..

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत सुन्दर रचना ... आभार

Sunil Kumar said...

गद्य काव्य की भावपूर्ण रचना , बधाई......

Dr (Miss) Sharad Singh said...

संवेदना से भरी मार्मिक रचना....
बहुत ही कोमल भावनाओं में रची-बसी खूबसूरत रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

dil ko choo lene wali rachna...sannate jab maun honge to patto ki khadkan ajeeb si anubhuti paida karte hain..pahli baar aapke blog pe aaya..accha laga..

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