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Monday, August 20, 2012

फिर एक नया कान - डॉ नूतन गैरोला

ear

उसकी देह पर

कितने ही कान उग आये थे |

हर बार एक नया कान

पर

भाग्य की वो लकीरें

हाथ की

जो जोड़ती थी अपनों से

बर्तनों को रगड़ते रगड़ते

कबकी घिस चुकी थीं|

 

हर बार दुत्कार ..

और कितने ही कानों का बोझा लिए

मात्र दो आँखें 

घूंट घूंट समुन्दर पीया करती थीं |

झूठन को पोंछता

छोटू

सुबह का सूरज भोर भये अंगीठी की आंच पर रखता

और दिन की सीमित चादर से

आसमां से फैले असीमित कामों को

पूरा कर ढकने  की पूरी कोशिश करता 

थकान कहीं छलके न,   दिन की चादर के किनारी पर चुपके उसकी पोटली बांधता

रात्री के अंधेरो पर विसर्जित करता|

इससे पहले    

रात को चाँद की चांदनी, पृथ्वी से भारी बर्तनों पर निखारता

सबको मुस्कुराता भोजन कराता

खुद

स्वाभिमान की थाली पर

दुत्कार, शोषण की जूठन रख भोजन करता|

 

और जब असहनीय हो जाता|

प्रताडनाओं के खौफ से

बंद पड़ जाते उसके पुराने कान

बिल्कुल बहरा हो जाता वह दुत्कार के लिए|

तड़प उठता वह फिर प्यार के लिए |

फिर एक नयी दौड

इस होटल से उस होटल तक शुरू होती

और फिर उसके बदन पर उग आते

बहुत ही संवेदनशील जो हर दिशाओं में घूमते है

प्यार के दो शब्द और

अपनेपन से भरी एक आवाज को सुनने को  तरसते

आशाओं से भरे

पुराने कानों की भीड़ में

एक अदद नए कान|… …

Sunday, December 4, 2011

तुम, मैं और वह कविता

 

                                                                                                                           4481012218_a66889ab28  

तुम्हें याद है क्या कि तुम किसी अनजान की कविता सुना रहे थे उस रात ..शायद तुमको तो  मालूम था तब कि कविता किसकी थी .. मैं तो  बस सुन रही थी ...सुनना मेरा काम था और सुनाना तुम्हारा  .. तुम  तो कविता में खोये थे और मैं, मैं  तुम  में ..

तुम  बोले जा रहे थे --

कुछ विकल जगारों की लाली

कुछ अंजन  की रेखा काली

उषा के अरुण झरोखे में

जैसे हो काली रात बसी

दो नयनों में बरसात बसी  ..

बिखरी बिखरी रूखी पलकें

भीगी भीगी भारी पलकें

प्राणों में कोई पीर बसी

मन में है कोई बात बसी

दो नयनों में बरसात बसी ...

         तुम  सुना रहे थे ..उधर बाहर बारिश का शोर था और इधर अंदर मेरी आँखों में भी बरसात का जोर था .. तुम  इन सबसे अनभिज्ञ पूरे मनोयोग से किताब पर मन लगाए हुवे थे और यह  बेदर्द कविता ज्यूं  मेरे ही हाल को बयां कर रही थी ...यही वह कविता थी न जिसने तुमको  मुझसे दूर कर दिया था| साथ रह कर भी हम तुम कहाँ साथ थे ….क्या तुम्हें मालूम है कि आज भी तुम यह कविता मेरे लिए गा सकते हो क्योंकि कुछ मेरा हाल ऐसा ही हो कर रह गया ... और मैं भी गुनगुना रही हूँ एक कविता की पंक्तियाँ

अब छूटता नहीं छुडाये

रंग गया ह्रदय है ऐसा

आंसूं से धुला निखरता

यह रंग अनोखा कैसा |

कामना कला की विकसी

कमनीय मूर्ति बन तेरी

खींचती है ह्रदय पटल पर

अभिलाषा बन कर मेरी |....

                              

                      अब तो मैं भी जानने लगी हूँ कि यह कविता किस ने लिखी है क्यूंकि अब मुझे भी कविताओं से प्रेम होने लगा है|......... रंग गयी हूँ रंग में तेरे .....और रॅाक स्टार मूवी के गाने के बोल फूट रहे है --

 

रंगरेज़ा रंगरेज़ा रंग मेरा तन मेरा मन

ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन

रंगरेज़ा रंगरेज़ा रंग मेरा तन मेरा मन

ले ले रंगाई चाहे तन चाहे मन ..

Tuesday, November 22, 2011

मेरा प्रेम मेरी चाय - डॉ नूतन गैरोला

                                                                                                                                                                    
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तू कड़क
तू है मीठी
अलसाई सी है हर सुबह
बिन तेरे .......
बिन तेरे
एक प्यास अनबुझी सी
हर शाम अधूरी सी ......
एक तलब
लबों तक आ कर बूझे
अंदाज है शौक़ीनों का
आवाज हैं चुस्की की  .....

 

डॉ नूतन गैरोला

 

प्रकृति से तो सभी प्रेम करते हैं पर व्यक्तिक तौर पर प्रेम हम किस से करते है - व्यक्ति विशेष, वस्तु विशेष, आदत विशेष, या शौक विशेष से|   और चाय के प्रति मेरा अगाध प्रेम है … वैसे भी हम पहाड़ियों को तो ठण्ड में राहत देने के लिए चाय एक शौक ही नहीं एक आदत बन जाती है जिसके बिना अधूरा अधूरा सा लगता है..


                        

Tuesday, September 27, 2011

असंतुलन - डॉ नूतन डिमरी गैरोला

 


        justice-vicitm

मेरी धरती मेरा आसमां

चरणों पे तेरे मैंने शीश झुका लिया था

फिसली मैं अगर तो भी  गिरी नहीं

गिरने से तुने मुझे बचा लिया था

धरती ने मुझे गोद में थामा

आकाश ने मुझे ऊँगली पकड़ उठा लिया था|

.

.

ये मेरे जमीं आसमां  थे ...पर आज सोचती हूँ मैं कहाँ ....

.

.

मैं अपनी धरती पर खड़ी हूँ पर आसमां मेरा नहीं...

आसमां को तलाश लेती हूँ तो वहाँ मेरी धरती नहीं ...

इस असंतुलन में झूलते झूलते

मैं खुद को निहारती हूँ तो पाती हूँ, मैं जो हूँ वो ही मैं नहीं....

.

.

खो दिया है मैंने खुद को..... 

.

.

दुनियादारी की जिम्मेदारियों में ...या सवारने में अपनी रूचियाँ |

जिम्मेदारियां अपनों की अपनी जिम्मेदारियों की ..

दौड़म दौड़, भागमभाग जाने .. जिंदगी की गाड़ी सुस्ताना चाहती है, रुकना चाहती है  ..लेकिन मंथर गति होते ही ठेलम ठेल ..

और रूचि, अभिलाषा भी अधिकार ज़माने लगी है ... अपने प्रति जिम्मेदारियां का अहसास जगाने लगी हैं .....

.

.

सोचती हूँ इन सब को छोड़ कर शांति की खोज में चले जाऊं ....

.

.

शांति तो बाहर भी होगी कहीं  और है मन के अंदर भी

अब इस शान्ति की खोज में कहाँ जाऊं ...

क्या बता सकेगा कोई .. ..कहाँ जाऊं किधर जाऊं .... 

.

.…

Thursday, August 4, 2011

हम सब एक हैं ….डॉ नूतन गैरोला

Religions-in-India1 

 

तुमने कभी इंसान की हड्डी को देखा है
कही भी जा दिखेगी हड्डी होती सिर्फ सफ़ेद है
क्या बोलती है वो
मैं हिंदू हूँ, मै मुस्लिम हूँ या कि ईसाई और सिख?


कभी पानी ना मिलेगा तो जानोगे प्यास होती है क्या?
पानी मांगेगा हिंदू , मांगेगा मुसलमान, मांगेगा ईसाई और सिख|

जख्म होगा देह में तो बहेगा खून सबका
खून का रंग होता है लाल
हिंदू में, मुसलमां में, ईसाई में और सिख में |

जाना है तुमने क्या, भाई भाई का खून कभी कभी
आपस में मिलता नहीं, रक्तदान के लिए आता है जो
वो अनजान भाई होता है कोई हिंदू, कोई मुसलमान, कोई ईसाई या सिख |

कभी जाना है तुमने धर्म होता है क्या पूजा होती है क्या
सत्मार्ग दिखाये धर्म
और भावनाये पूजा में होती हैं-
मानवता के कल्याण की, प्रेम की सौहार्द की
सत्मार्ग दिखाए चाहे धर्म हो हिंदू या कि मुस्लिम या ईसाई या सिख|
फिर ये नफरत की दीवारें क्यों, लहू लहू का प्यासा क्यों |

नूतन गैरोला .. ४ / अगस्त / २०११ १० :५२

 

अभी लिखी और पोस्ट की है …. बाद में एडिटिंग होगी.. मुस्‍कान

Wednesday, August 3, 2011

हम सब एक हैं ….डॉ नूतन गैरोला

Religions-in-India1 

 

तुमने कभी इंसान की हड्डी को देखा है
कही भी जा दिखेगी हड्डी होती सिर्फ सफ़ेद है
क्या बोलती है वो
मैं हिंदू हूँ, मै मुस्लिम हूँ या कि ईसाई और सिख?


कभी पानी ना मिलेगा तो जानोगे प्यास होती है क्या?
पानी मांगेगा हिंदू , मांगेगा मुसलमान, मांगेगा ईसाई और सिख|

जख्म होगा देह में तो बहेगा खून सबका
खून का रंग होता है लाल
हिंदू में, मुसलमां में, ईसाई में और सिख में |

जाना है तुमने क्या, भाई भाई का खून कभी कभी
आपस मिलता नहीं, रक्तदान के लिए आता है जो
वो अनजान भाई होता है कोई हिंदू, कोई मुसलमान, कोई ईसाई या सिख |

कभी जाना है तुमने धर्म होता है क्या पूजा होती है क्या
सत्मार्ग दिखाये धर्म
और भावनाये पूजा में होती हैं-
मानवता के कल्याण की, प्रेम की सौहाद्र की
सत्मार्ग दिखाए चाहे धर्म हो हिंदू या कि मुस्लिम या ईसाई या सिख|
फिर ये नफरत की दीवारें क्यों, लहू लहू का प्यासा क्यों |

नूतन गैरोला .. ४ / अगस्त / २०११ १० :५२

 

अभी लिखी और पोस्ट की है …. बाद में एडिटिंग होगी.. मुस्‍कान

Saturday, July 9, 2011

दस जुलाई को खुशियाँ --

आज १० जुलाई को हमारे घर में खुशियां - बड़ी बेटी के रूप में मैं पैदा हुई और आज के ही दिन छोटे भाईसाहब की शादी हुई मतलब घर में छोटी बहु आई - है ना कितनी खुशी की बात |

फेसबुक में हमारी मित्र मंडली के मित्र श्री प्रतिबिम्ब जी ने मित्रमंडली की तरफ से भईया भाभी जी और मेरे चित्रों के द्वारा एक सुन्दर शुभकामना कार्ड इस तरह भेजा जिस पर सभी मित्रों ने हमें बधाई और शुभकामनायें दी ..

Untitled

१० जुलाई २०११ [ दो शुभ अवसर एक साथ ]
मनमोहन जी एवं इंदिरा जी आप दोनों को शादी की सालगिरह पर बहुत बहुत मुबारकबाद एवं शुभकामनायें !!! साथ ही नूतन जी का जन्मदिन है - नूतन जी आप के जन्मदिन पर ढेरो बधाई एवं शुभकामनायें!!
[मनमोहन जी नूतन जी आप दोनों भाई बहनो एवं परिवार के लिए हमारी मंगलकमनायें है इस शुभ अवसर पर - खुशी, स्वस्थता, सफलता और मुस्कराहट का सदैव साथ बना रहे ]
- फेसबुक मित्र मंडली

आज तो मै चली खुशियां मनाने …..